(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.44. अध्यायः 044
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरम्प्रति ब्रह्मणा देवान्प्रत्यनूदितसुपर्णोपाख्यानकथनसमापनम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

name="anuzAsana-13-44-1x">ऋषय ऊचुः।

अहो श्रावितमाख्यानं भवताऽत्यद्भुतं महत्।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत्॥ 13-44-1(82670)
एतत्पवित्रं देवानामेतद्गुह्यं परंतप।
एतज्ज्ञानवता ज्ञेयमेषा गतिरनुत्तमा॥ 13-44-2(82671)
य इमां श्रावयेद्विद्वान्कथां पर्वसुपर्वसु
स लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यान्देवर्षिभिरभिष्टुतान्॥ 13-44-3(82672)
श्राद्धकाले च विप्राणां य इमां श्रावयेच्छुचिः।
न तत्र रक्षसां भागो नासुराणां च विद्यते॥ 13-44-4(82673)
अनसूयुर्जितक्रोधः सर्वसत्वहिते रतः।
यः पठेत्सततं युक्तः स व्रजेत्तत्सलोकताम्॥ 13-44-5(82674)
वेदान्पारयते विप्रो राजा विजयवान्भवेत्।
वैश्यस्तु धनधान्याढ्यः शूद्रः सुखमवाप्नुयात्॥ 13-44-6(82675)
भीष्म उवाच। 13-44-7x(6844)
ततस्ते मुनयः सर्वे सम्पूज्य विनतासुतम्।
स्वानेव चाश्रमाञ्जग्मुर्बभूवुः शान्तितत्पराः॥ 13-44-7(82676)
स्थूलदर्शिभिराकृष्टो दुर्ज्ञेयो ह्यकृतात्मभिः।
एषा धुतिर्महाराज धर्म्या धर्मभृतांवर॥ 13-44-8(82677)
सुराणां ब्रह्मणा प्रोक्ता विस्मितानां परंतप।
मयाप्येषा कथा तात कथिता मातुरन्तिके।
वसुभिः सत्त्वसम्पन्नैस्तवाप्येषा मयोच्यते॥ 13-44-9(82678)
तदग्निहोत्रपरमा जपयज्ञपरायणाः।
निराशीर्बन्धनाः सन्तः प्रयान्त्यक्षरसात्मतां॥ 13-44-10(82679)
आरम्भयज्ञानुत्सृज्य जपहोमपरायणाः।
ध्यायन्तो मनसा विष्णुं गच्छन्ति परमां गतिम्॥ 13-44-11(82680)
तदेष परमो मोक्षो मोक्षद्वारं च भारत।
यथा विनिश्चितात्मानो गच्छन्ति परमां गतिम्॥ ॥ 13-44-12(82681)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ 44 ॥


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